आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (Code of Criminal Procedure – CrPC) | सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में


जहाँ भारतीय दंड संहिता (IPC, 1860) यह तय करती है कि कौन सा कार्य अपराध है और उसकी क्या सज़ा होगी, वहीं दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC, 1973) यह बताती है कि अपराध होने के बाद जांच, गिरफ्तारी, सुनवाई और सज़ा देने की पूरी प्रक्रिया कैसे होगी।
यह भारत की Criminal Justice System की रीढ़ है और इसे 1 अप्रैल 1974 से पूरे देश में लागू किया गया।


  1. जांच की प्रक्रिया (Investigation):
    अपराध दर्ज होने के बाद पुलिस किस तरह जांच करेगी।
  2. गिरफ्तारी और जमानत (Arrest & Bail):
    आरोपी को कैसे गिरफ्तार किया जाएगा और किन अपराधों में जमानत मिल सकती है।
  3. अदालत की शक्तियाँ (Powers of Court):
    मजिस्ट्रेट और सत्र न्यायालय की शक्तियाँ व अधिकार।
  4. ट्रायल की प्रक्रिया (Trial):
    मुकदमे की सुनवाई किन चरणों में होगी।
  5. अपील और पुनर्विचार (Appeal & Revision):
    निचली अदालत के निर्णय के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील की व्यवस्था।
  6. मृत्युदंड की पुष्टि:
    किसी भी मृत्युदंड को केवल उच्च न्यायालय की पुष्टि के बाद ही लागू किया जा सकता है।

1. धारा 41 – गिरफ्तारी (Arrest without Warrant)

पुलिस को किन परिस्थितियों में बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार है।

2. धारा 57 – 24 घंटे के अंदर अदालत में पेश करना

गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक हिरासत में बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के नहीं रखा जा सकता।

3. धारा 125 – भरण–पोषण (Maintenance)

पति द्वारा पत्नी, बच्चों और माता-पिता को भरण–पोषण न देने की स्थिति में अदालत आदेश दे सकती है।

4. धारा 154 – FIR दर्ज करना

किसी भी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस के लिए FIR दर्ज करना अनिवार्य है।

5. धारा 167 – पुलिस रिमांड

आरोपी को पुलिस हिरासत में रखने की अधिकतम अवधि निर्धारित करती है।

6. धारा 173 – चार्जशीट

जांच पूरी होने के बाद पुलिस को चार्जशीट दाखिल करनी होती है।

7. धारा 197 – सरकारी अधिकारियों पर अभियोजन

सरकारी कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले सरकार की अनुमति आवश्यक।

8. धारा 313 – अभियुक्त से प्रश्न पूछना

ट्रायल के दौरान आरोपी से सीधे प्रश्न पूछने का अधिकार अदालत को होता है।

9. धारा 320 – अपराधों का समझौता (Compounding of Offences)

कुछ अपराधों में दोनों पक्ष आपसी सहमति से मामला खत्म कर सकते हैं।

10. धारा 482 – उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियाँ

न्याय के हित में उच्च न्यायालय को विशेष शक्तियाँ प्रदान करती है।


मान लीजिए, किसी व्यक्ति को चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। CrPC की धारा 57 के अनुसार पुलिस उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करेगी। यदि आरोपी चाहे तो धारा 437/439 CrPC के अंतर्गत जमानत की अर्जी लगा सकता है।


दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) भारतीय आपराधिक कानून का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह सुनिश्चित करता है कि अपराध की जांच और मुकदमे की प्रक्रिया निष्पक्ष और कानूनी तरीके से हो।

👉 यदि आप विधि के छात्र हैं या प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो CrPC की धाराएँ अवश्य पढ़ें।

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